Tuesday 30 July 2013

डेयरी और खेती में उषा ने लिखी कामयाबी की नई इबारत

घर-परिवार तक सीमित रहने वाली उषा ने जब दो गायों के साथ दूध बेचने का व्यवसाय शुरू किया तब उसने सोचा भी नहीं था कि एक दिन उसके डेयरी फॉर्म से साढ़े तीन सौ लीटर दूध की बिक्री होगी। शुरूआत जरूर संघर्ष भरा था, लेकिन उषा के हौसले बुलंद थे। दो से चार, चार से आठ और आठ से सोलह करते-करते उसने अपना डेयरी फॉर्म तैयार किया। उषा की सफलता से आसपास के लोग भी प्रेरित हुए। दूसरे किसान भी डेयरी से होने वाले फायदे को देखकर गौपालन को गंभीरता से लेने लगे। उनके दूध की भी बिक्री की व्यवस्था उषा ने की। आज गांववाले रोज डेढ़ सौ लीटर दूध उषा को बेचने के लिए देते हैं। उनके खुद के डेयरी फॉर्म से हर रोज दो सौ लीटर दूध निकलता है। इस तरह गांव में साढ़े तीन सौ लीटर दूध का उत्पादन प्रतिदिन हो रहा है। 

छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के ग्राम जवाली की रहने वाली उषा आज अपने गांव की सरपंच है। कामयाब पशुपालक के साथ-साथ उन्नत कृषक के रूप में उसके परिवार की पहचान है। अपने पति श्री यशवंत पटेल की मदद से उषा 40 एकड़ के रकबे में धान, गेहूं, टमाटर, धनिया, मिर्च, पपीता, केला और सूरजमुखी की खेती करती है। अपने खेतों में वे रासायनिक खाद और कीटनाशकों का प्रयोग कम से कम करते हैं। डेयरी के व्यवसाय ने ही उसके लिए जैविक खाद और कीटनाशकों का इंतजाम कर दिया है। खुद के तैयार किए हुए कंपोस्ट खाद, गोबर खाद और केंचुआ खाद का इस्तेमाल वे करते हैं। फसलों को कीड़ों और बीमारियों से बचाने के लिए वे गौमूत्र से बने कीटनाशक ही प्रयोग करते हैं। जैविक खाद और कीटनाशक के उपयोग से न केवल उनकी पैदावार बढ़ी है, बल्कि खेती की लागत भी बहुत कम हो गई है। गाय के गोबर से उषा बायोगैस संयंत्र चलाती है। इससे भी खाना पकाने के लिए ईंधन में होने वाले खर्च की बचत होती है। डेयरी और पशुपालन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए राज्य शासन ने उषा को कृषि उत्पादकता पुरस्कार से नवाजा है।

उषा बताती है कि उसकी सफलता में कृषि और पशुधन विकास विभाग के अधिकारियों का भी योगदान है। दुधारू पशुओं के टीकाकरण, उनकी उचित देखभाल और पौष्टिक चारे के बारे में मार्गदर्शन वह अधिकारियों से लेती रहती है। हरे चारे के रूप में अजोला घास के उत्पादन और पैरे को यूरिया उपचारित कर उसकी पौष्टिकता बढ़ाने के गुर उसे पशुधन विकास विभाग के अधिकारियों से ही प्राप्त हुए। इससे उन्हें दूध का उत्पादन बढ़ाने में काफी मदद मिली। विभागीय योजनाओं और सरकार द्वारा किसानों को दिए जा रहे अनुदानों की जानकारी भी वे लेती रहती हैं। कृषि विभाग के अधिकारियों की सलाह पर उन्नत और वैज्ञानिक तरीके से खेती कर उन्होंने अपने पैदावार में अच्छी बढ़ोतरी की है।

 पिछले 12 साल से डेयरी व्यवसाय से जुड़ी उषा का कहना है कि छत्तीसगढ़ में खेती के साथ-साथ पशुपालन और डेयरी के धंधे के लिए भी किसानों को प्रेरित किया जाना चाहिए। इससे किसानों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी। उनका कहना है कि सहकारी समितियों के माध्यम से विकासखंड और जिला स्तर पर दूध खरीदी केंद्र स्थापित किए जाने चाहिए। इससे पशुपालकों को उनके दूध की सही कीमत मिलेगी। कामयाब उद्यमी और संवेदनशील जनप्रतिनिधि के रूप में पहचान बनाने वाली उषा का मानना है कि खेती, पशुपालन और डेयरी; तीनों के संयुक्त उपक्रम से छत्तीसगढ़ के किसान समृद्ध हो सकते हैं। इस तरह की समन्वित खेती से खाद और कीटनाशक की जरूरत भी पूरी होती है जिससे यहां के किसान जैविक खेती कर अपनी उपज का बेहतर दाम हासिल कर सकते हैं।

Tuesday 16 July 2013

छत्तीसगढ़ में फल-फूल रहा है मछली पालन व्यवसाय

छत्तीसगढ़ में मछली उत्पादन लगातार बढ़ रहा है। पिछले वित्तीय वर्ष 2012-13 में प्रदेश में दो लाख 55 हजार मीटरिक टन से अधिक मछली का उत्पादन हुआ है। मछली उत्पादन के मामले में पूरे देश में छत्तीसगढ़ अब छठवें स्थान पर पहुंच गया है। राज्य गठन के समय यहां मछली का सालाना उत्पादन मात्र 93 हजार मीटरिक टन था। बीते 12 वर्षों में प्रदेश में मछली उत्पादन में औसत वार्षिक वृद्धि दर 14 फीसदी से अधिक रही है। यही कारण है कि राज्य निर्माण के 12 बरस बाद ही छत्तीसगढ़ देश के प्रमुख मछली उत्पादक राज्यों में शुमार हो गया है। वित्तीय वर्ष 2013-14 के लिए कुल पौने तीन लाख मीटरिक टन से अधिक मछली उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इनमें से दो लाख 65 हजार मीटरिक टन मछली निजी तालाबों से, करीब नौ हजार मीटरिक टन सिंचाई जलाशयों से और एक हजार 200 मीटरिक टन राज्य की नदियों से पकड़े जाएंगे। उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ में अभी करीब 59 हजार तालाबों, लघु, मध्यम और बड़े आकार के एक हजार 760 सिंचाई जलाशयों और साढ़े तीन हजार से भी अधिक लंबे नदी क्षेत्र में मछली पालन का काम हो रहा है।

मछली पालन कम लागत और मेहनत में अधिक मुनाफा देने वाला धंधा है। आमदनी के साथ-साथ यह परिवार की प्रोटीनयुक्त भोजन की जरूरत भी पूरी करता है। मछली पालन के व्यवसाय में लगा व्यक्ति अपने साथ कई और लोगों को भी रोजगार प्रदान करता है। मछली की बढ़ती मांग और इसके लगातार बढ़ते बाजार के कारण इस धंधे में मुनाफे की अच्छी संभावना है। प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से वर्तमान में छत्तीसगढ़ के करीब दो लाख 10 हजार लोग इस धंधे में लगे हुए हैं। मछली पालन के माध्यम से अभी प्रदेश में हर साल लगभग एक करोड़ 42 लाख मानव दिवस रोजगार का सृजन हो रहा है। जबकि दस वर्ष पहले इस व्यवसाय में सालाना केवल 63 हजार मानव दिवस रोजगार का सृजन हो पाता था।

मछली पालन को बढ़ावा देने, इसका उत्पादन बढ़ाने और इस कार्य में लगे लोगों के कल्याण के लिए छत्तीसगढ़ शासन हरसंभव मदद मुहैया करा रही है। इस व्यवसाय से जुड़े लोगों के आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा के लिए शासन द्वारा निःशुल्क दुर्घटना बीमा किया जाता है। इसके अंतर्गत बीमित मछुआरे की दुर्घटनावश मृत्यु अथवा स्थाई अपंगता पर एक लाख रूपए और अस्थाई अपंगता पर 50 हजार रूपए की सहायता राशि प्रदान की जाती है। प्रदेश का मछली पालन विभाग इस योजना का लाभ अधिक से अधिक मछुआरों तक पहुंचाने में सक्रियता के साथ लगा हुआ है। पिछले वित्तीय वर्ष के दौरान प्रदेश के एक लाख 60 हजार मछुआरों का दुर्घटना बीमा कराया गया था। बीमित मछुआरों की संख्या के मामले में छत्तीसगढ़ पूरे देश में तीसरे स्थान पर है।  

राष्ट्रीय मछुआरा कल्याण कार्यक्रम के तहत मछुआरों के लिए आवास योजना शुरू की गई है। इसके तहत आवास निर्माण के लिए शासन द्वारा मछुआरों को 50 हजार रूपए की आर्थिक मदद दी जा रही है। पिछले वित्तीय वर्ष के दौरान 200 मछुआरों को मकान बनाने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की गई है। मछलियों का प्रजनन काल होने की वजह से प्रतिवर्ष 15 जून से 15 अगस्त तक मत्स्याखेट पर प्रतिबंध रहता है। इस दौरान मछुआरों को होने वाले आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए तीन महीने तक प्रति माह 600 रूपए की आर्थिक सहायता दी जाती है। इसके लिए 1200 रूपए का अंशदान शासन द्वारा दिया जाता है। जबकि मस्त्याखेट के नौ माह के दौरान कुल मात्र 600 रूपए का अंशदान हितग्राही से लिया जाता है।

मछली पकड़ने के लिए नाव, जाल और अन्य उपकरणों की खरीदी के लिए भी विभाग द्वारा आर्थिक मदद दी जाती है। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत मछली पालन के लिए दीर्घकालीन पट्टाधारी मछुआरों को नाव और जाल की खरीदी के लिए 25 हजार रूपए प्रदान किए जाते हैं। मछुआ सहकारी समितियों को भी नाव, ड्रेग नेट एवं गिल नेट खरीदने के लिए एक लाख रूपए की आर्थिक मदद दी जाती है। वर्ष 2012-13 में इसके अंतर्गत 150 मछुआ समितियों और 200 मछुआरों को आर्थिक सहायता प्रदान की गई है। इसी तरह मत्स्य पालन प्रसार योजना के तहत नाव और जाल खरीदने के लिए मछुआरों को दस हजार रूपए दिए जाते हैं। पिछले वित्तीय वर्ष के दौरान 533 मछुआरों को इस योजना के तहत सहायता दी गई थी। पंजीकृत मछुआ सहकारी समितियों को मछली पालन उपकरण और तालाब पट्टा, मछली बीज, नाव और जाल खरीदने के लिए तीन वर्षों की अवधि में 25 हजार रूपए तक की आर्थिक मदद भी विभाग द्वारा प्रदान किया जाता है। इसके अंतर्गत गत वित्तीय वर्ष में 97 मछुआ सहकारी समितियों को आर्थिक मदद दी गई थी। हाट-बाजारों और गली-मोहल्लों में घूमकर मछली बेचने वाले मछुआरों को आइस-बॉक्स और तराजू-बॉट खरीदने के लिए छः हजार रूपए तक की आर्थिक मदद भी विभाग प्रदान करता है। इसके अंतर्गत 2012-13 में 340 मछुआरों को राशि दी गई है। 

मछली बीज के उत्पादन में अब छत्तीसगढ़ न केवल आत्मनिर्भर है, बल्कि पड़ोसी राज्यों को भी इसकी आपूर्ति करता है। मत्स्य बीज उत्पादन के मामले में छत्तीसगढ़ का देश में पांचवां स्थान है। वर्ष 2012-13 में यहां लक्ष्य से अधिक कुल 10 हजार 437 मानक फ्राई मछली बीज का उत्पादन हुआ है। राज्य गठन के समय मछली बीज की जरूरत के लिए छत्तीसगढ़ दूसरे राज्यों पर निर्भर था। पिछले 12 वर्षों में शासकीय एवं निजी क्षेत्रों में 20 नए हैचरी प्रक्षेत्रों की स्थापना हुई है, जिसके फलस्वरूप राज्य इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन गया है। मत्स्य कृषकों को उच्च गुणवत्ता के मछली बीज अब स्थानीय स्तर पर ही पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। 

पिछले एक दशक में छत्तीसगढ़ में मछली की उत्पादकता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। यहां के तालाबों और सिंचाई जलाशयों में मछली की उत्पादकता राष्ट्रीय औसत से अधिक है। प्रदेश में तालाबों की उत्पादकता सालाना दो हजार 972 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह औसत केवल दो हजार 250 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर वार्षिक है। छत्तीसगढ़ में सिंचाई जलाशयों की औसत उत्पादकता राष्ट्रीय औसत के ढाई गुने से भी अधिक है। यहां के सिंचाई जलाशयों की औसत उत्पादकता सालाना 185 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह औसत मात्र 69 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर वार्षिक है।

Sunday 11 November 2012

हर कदम पर श्रमवीरों के साथ छत्तीसगढ़

भवन निर्माण का काम करने वाले मोहन को बेटी की शादी की चिंता सता रही थी। बेटी के विवाह के लिए उन्होंने कुछ रूपए तो जोड़ लिए थे, लेकिन वह अपर्याप्त था। बाकी पैसों का इंतजाम कैसे होगा इसकी चिंता उसे खाए जा रही थी। ऐसे समय में उसकी मदद की श्रम विभाग द्वारा संचालित राजमाता विजयाराजे सामूहिक विवाह योजना ने। इस योजना के अंतर्गत प्राप्त दस हजार रूपयों की मदद से मोहन ने अपनी बेटी का विवाह संपन्न कराया। श्रम विभाग की इसी तरह की मदद से नारायणपुर जिले की शिवनबती और रमोली का भी विवाह हुआ। पिता के निधन के बाद दोनों के विवाह की बड़ी जिम्मेदारी इनके परिजनों पर थी जिसे राजमाता विजयाराजे सामूहिक विवाह योजना की सहायता से परिवार ने अंजाम दिया। ऐसे कई उदाहरण हैं जब प्रदेश की संवेदनशील सरकार ने अभिभावक का कर्त्तव्य निभाया। श्रम विभाग द्वारा संचालित कई कल्याणकारी योजनाओं ने प्रदेश के मेहनतकश तबके की परेशानियां कम की हैं और उनका जीवन स्तर ऊंचा उठाया है। कर्मचारी राज्य बीमा सेवा, श्रम कल्याण मंडल, भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण मंडल एवं असंगठित कर्मकार राज्य सामाजिक सुरक्षा मंडल द्वारा संचालित अनेक योजनाओं के माध्यम से छत्तीसगढ़ की गांव, गरीब और किसानों की हितैषी सरकार हर कदम पर प्रदेश के श्रमवीरों के साथ है।

प्रदेश के संगठित क्षेत्र के श्रमिक हों या असंगठित क्षेत्र के, खेतिहर मजदूर हों या कारखानों में काम करने वाले कामगार, बाल श्रमिक शालाओं में पढ़ने वाले बच्चे हों या जीवन-संघर्ष में पुरूषों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही महिला मजदूर, फुटपाथ पर काम कर अपना गुजर बसर करने वाले लोग हों या रिक्शा-ठेला खींचकर जीवन यापन करने वाला तबका, श्रमिकों के हर वर्ग का ख्याल प्रदेश के मुखिया डॉ. रमन सिंह ने रखा है। अखबार बाटने वाले हॉकरों को भी सरकार निःशुल्क सायकलें दे रही हैं। श्रम विभाग के अंतर्गत विभिन्न मंडलों का गठन कर सरकार श्रमिकों के कल्याण के लिए कई अभिनव योजनाएं संचालित कर रही है। प्रदेश के श्रमवीरों की बेहतरी के लिए जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन के हर क्षेत्र के लिए सरकार योजनाएं चला रही है। इन योजनाओं के लाभार्थी केवल मजदूर ही नहीं हैं, बल्कि उनका पूरा परिवार है। छत्तीसगढ़ देश का इकलौता राज्य है जहां असंगठित क्षेत्र के निर्माण मजदूरों के लिए सरकार ने पेंशन योजना शुरू की है।

श्रम विभाग ने छत्तीसगढ़ महतारी यानि प्रदेश की महिला मजदूरों का खास ध्यान रखा है। भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण मंडल द्वारा संचालित मुख्यमंत्री सायकल सहायता योजना के तहत 18 से 25 वर्ष की पंजीकृत निर्माणी महिला श्रमिकों को सायकल प्रदान किया जा रहा है जिससे ये स्वावलंबी बन सके और घर से दूर काम पर जाने के लिए इन्हें किसी और के आसरे की जरूरत न पड़े। इस योजना के माध्यम से अब तक 8,634 महिलाओं को सायकल वितरित किया जा चुका है। इसी तरह मुख्यमंत्री सिलाई मशीन सहायता योजना के तहत 26 से 60 वर्ष तक की 10,215 पंजीकृत निर्माणी महिला श्रमिकों को सिलाई मशीन प्रदान किया गया है। सिलाई मशीन मिलने से ये महिलाएं खाली समय में सिलाई कर अतिरिक्त कमाई कर रही हैं। भगिनी प्रसूति सहायता योजना एवं चलित झूलाघर योजना असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिला श्रमिकों के लिए अभिनव कदम है। भगिनी प्रसूति सहायता योजना के अंतर्गत बच्चे के जन्म के समय निर्माणी महिला श्रमिकों को मातृत्व हितलाभ के रूप में शासन द्वारा 7,000 रूपए दिए जा रहे हैं। निर्माणी पुरूष श्रमिकों को भी पत्नी के मातृत्व अवकाश के समय सेवा के लिए पितृत्व हितलाभ के रूप में 3,000 रूपए प्रदान किया जाता है। इस योजना के तहत प्रदेश में अब तक 2,636 श्रमिक लाभान्वित हुए हैं।

छत्तीसगढ़ की संवेदनशील सरकार हर जरूरतमंद श्रमिक के साथ खड़ी हुई है। राजमाता विजयाराजे सामूहिक विवाह योजना ने निर्माणी श्रमिकों को बच्चों के विवाह जैसे पारिवारिक जिम्मेदारियों के निर्वहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस योजना के तहत निर्माणी श्रमिकों को स्वयं के या बेटियों के विवाह के लिए 10,000 रूपए की आर्थिक सहायता शासन द्वारा दी जाती है। इस योजना के तहत पिछले दो सालों में 966 निर्माणी श्रमिकों को आर्थिक सहायता प्रदान की गई है।

निर्माणी श्रमिकों की व्यवसायगत जरूरतों के मद्देनजर सरकार मुख्यमंत्री श्रमिक औजार सहायता योजना के तहत उन्हें औजार मुहैया करा रही है। श्रमिकों को उनके काम के अनुसार कारपेंटर, प्लंबर, राजमिस्त्री, इलेक्ट्रिशियन और पेंटरों को भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण मंडल द्वारा औजार किट्स वितरित किए गए हैं। इस योजना के अंतर्गत अब तक 11,415 श्रमिकों को औजार दिए गए हैं। इतना ही नहीं, सरकार श्रमिकों के कौशल उन्नयन के लिए भी कार्यक्रम चला रही है। राजमिस्त्री प्रशिक्षण योजना के अंतर्गत प्रतिवर्ष 1,000 श्रमिकों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए शासन ने छत्तीसगढ़ निर्माण एकेडमी से एम.ओ.यू भी किया है। योजना के प्रथम चरण में एकेडमी ने राजनांदगांव में 38 श्रमिकों को राजमिस्त्री का प्रशिक्षण दिया है। इन 38 प्रशिक्षित श्रमिकों में 26 महिलाएं हैं।

श्रम विभाग द्वारा संचालित बाल श्रमिक शालाएं बाल श्रम के उन्मूलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। निःशुल्क स्कूल ड्रेस, जूता-मोजा, स्कूल बैग, कापी-पुस्तक और ध्यान्ह भोजन के साथ-साथ सरकार नौनिहाल छात्रवृत्ति योजना के माध्यम से बाल श्रमिक शालाओं में पढ़ने वाले सभी बच्चों को छात्रवृत्ति मुहैया करा रही है जिससे वे बिना किसी दिक्कत के अपनी पढ़ाई पूरी कर सकें

प्रदेश के श्रमवीरों की बुनियादी और व्यवसायिक जरूरतों के साथ-साथ सरकार उनकी सेहत का भी ध्यान रख रही है। असंगठित कर्मकार राज्य सामाजिक सुरक्षा मंडल और भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण मंडल के अंतर्गत पंजीकृत असंगठित क्षेत्र के ऐसे कामगारों को जो गरीबी रेखा के नीचे नहीं आते, उनके लिए भी राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत इलाज के लिए शासन ने स्मार्ट कार्ड जारी किए हैं। 15,000 रूपए तक प्रतिमाह वेतन पाने वाले संगठित क्षेत्र के श्रमिकों और उनके परिजनों को इलाज की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए शासन ने कर्मचारी राज्य बीमा सेवा के अंतर्गत उनका बीमा करवाया है। राज्य बनने के समय इस योजना के अंतर्गत बीमित व्यक्तियों की संख्या लगभग तीस हजार थी जो अब करीब तीन लाख तक पहुंच चुकी है। कर्मचारी राज्य बीमा सेवा के प्रदेश भर में 22 औषधालय हैं जहां बीमित व्यक्ति अथवा उनके परिजन निःशुल्क इलाज करा सकते हैं। प्रदेश के विभिन्न शहरों में श्रम विभाग इस तरह के 20 नए औषधालय शीघ्र ही शुरू करने जा रहा है ताकि अधिक से अधिक कर्मचारियों को निःशुल्क इलाज की सुविधा मिल सके। साथ ही श्रम विभाग कर्मचारी राज्य बीमा सेवा के अंतर्गत रायपुर, भिलाई और कोरबा में 100 बिस्तरों वाले अस्पताल शुरू करने की तैयारी में है।

छत्तीसगढ़ की सरकार ने गांव, गरीब और किसानों के हित में अभिनव फैसले लेकर हमेशा अपनी संवेदनशीलता का परिचय दिया है। प्रदेश के श्रमवीरों के कल्याण के लिए संचालित ये योजनाएं यह साबित करती है कि प्रदेश के मुखिया डॉ. रमन सिंह की प्राथमिकताओं में समाज के सबसे कमजोर तबके की चिंता भी शुमार है। श्रम विभाग की इन कल्याणकारी योजनाओं ने न केवल उन्हें बेहतर सामाजिक सुरक्षा प्रदान की है बल्कि उनका जीवन स्तर और रहन-सहन भी ऊंचा उठाया है। 

Friday 2 November 2012

जैविक खाद बनाकर एक लाख रूपए हर माह कमा रही हैं महिलाएं

छत्तीसगढ़ की महिलाएं स्वसहायता समूह के माध्यम से नित नई सफलता की इबारत लिख रही हैं। प्रदेश की महिलाएं छोटे-छोटे स्वसहायता समूह बनाकर घर-परिवार की जिम्मेदारियों के साथ आर्थिक मोर्चे पर भी फतह हासिल कर रही हैं। प्रदेश का कृषि विभाग जैविक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए कई योजनाएं चला रही है। विभाग के इस काम में राज्य की महिला स्वसहायता समूह भी अपना योगदान दे रही हैं। दुर्ग जिले के ग्राम नगपुरा के जय सतनाम महिला स्वसहायता समूह की महिलाएं स्थानीय बाजारों में बिक्री के लिए जैविक खाद तैयार कर रही हैं। इस समूह की महिलाएं केंचुआ खाद का उत्पादन कर प्रति माह एक लाख रूपए कमा रही हैं। समूह की महिलाएं कृषि विभाग द्वारा लगाई जाने वाली प्रदर्शनियों में अन्य महिलाओं को इसका प्रशिक्षण भी देती हैं। इनकी सफलता से प्रभावित होकर भिलाई इस्पात संयंत्र ने इन्हें अपने गोद लिए हुए गांवों में केंचुआ खाद बनाने के प्रशिक्षण का कार्य भी सौंपा है।

कमजोर माली हालत वाले जय सतनाम महिला स्वसहायता समूह की महिलाओं ने करीब दशक भर पहले अपने गांव की श्रीमती नीता गायकवाड़ के नेतृत्व में 12 महिलाओं का समूह बनाकर नगपुरा के ग्रामीण बैंक में 30 रूपए प्रति सदस्य की दर से पूंजी एकत्र करना शुरू किया। इन महिलाओं की लगन और संगठन भावना से प्रभावित होकर कृषि विभाग के अधिकारियों ने वर्ष 2004 में इनके लिए कृषि प्रक्षेत्र रूआबांधा (दुर्ग) में केंचुआ खाद उत्पादन संबंधी प्रशिक्षण की व्यवस्था की। कृषि विभाग के अनुदान से इन महिलाओं ने केंचुआ खाद के दो टांकों का निर्माण कर इसका उत्पादन प्रारंभ किया। विभाग के अधिकारियों के मार्गदर्शन में इन महिलाओं के बनाए खाद की बिक्री की व्यवस्था की गई।

छत्तीसगढ़ शासन के नवा अंजोर योजना से समूह को बड़ी मदद मिली। इस योजना के तहत जय सतनाम महिला स्वसहायता समूह ने वर्ष 2008 में 50,000 रूपए का अनुदान प्राप्त कर केंचुआ खाद के छह नए टांकों का निर्माण कर अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाई। इन महिलाओं के कार्य को देखकर कृषि विभाग ने वर्ष 2010 में समूह की सचिव श्रीमती गौरीबाई टंडन और सदस्य श्रीमती तीजन महंते को अतिरिक्त टांकों के निर्माण के लिए 12,000 रूपए की मदद मुहैया कराई। वर्तमान में समूह के पास खाद उत्पादन के लिए दस टांके हैं। प्रति टांका 30 क्विंटल के हिसाब से समूह हर महीने 300 क्विंटल खाद का उत्पादन कर रहा है। पांच रूपए प्रति किलो की दर से खाद बेचने पर महिलाओं को हर महीने डेढ़ लाख रूपए मिलते हैं। 300 क्विंटल खाद उत्पादन की लागत 50,000 रूपए आती है। इस तरह समूह की महिलाएं हर महीने एक लाख रूपया का शुद्ध मुनाफा कमा रही हैं।

जय सतनाम महिला स्वसहायता समूह द्वारा बनाए गए खाद की बिक्री दुर्ग-भिलाई के बाजारों में आसानी से हो रही है। सही और जल्दी तौल के लिए महिलाओं ने इलेक्ट्रॉनिक तौलाई मशीन भी खरीद ली है। समूह की महिलाएं बचत के रूप में बैंक में अब हर महीने सौ रूपए जमा कर रही हैं। केंचुआ खाद के उत्पादन से हो रही आमदनी इन महिलाओं की अतिरिक्त कमाई है। बाकी समय में ये महिलाएं कृषि संबंधी अन्य कार्य भी करती हैं। स्वावलंबन के दम पर समूह की महिलाएं अपने घरों की माली हालत सुधार रही हैं। जय सतनाम महिला स्वसहायता समूह के कार्य प्रदेश की अन्य महिला स्वसहायता समूहों के लिए अनुकरणीय और प्रेरणादाई है।  

Monday 22 October 2012

छत्तीसगढ़ में खेती से बढ़ती खुशहाली

सियाराम सोनकर, सुमेश साहू, सुखराम वर्मा, शेरसिंह ठाकुर, पंकज टांक, टेकराम देवांगन, सुरेन्द्र बेलचंदन, अभीजित अग्रवाल, शरद जोशी, गुलाब बघेल, गंगाराम साहू, खोरबाहरा चुरेंद्र... इस सूची में और भी कई नाम हैं जो महज नाम नहीं मिसाल हैं। ये सभी छत्तीसगढ़ के नई पीढ़ी के किसान हैं। इन्होंने खेती के नए तौर-तरीके अपनाएं, कृषि विभाग की सलाह ली, उनकी योजनाओं व शासन द्वारा दिए जा रहे अनुदानों का फायदा उठाया और खेतों में मेहनत कर सफलता की नई कहानियां लिखी। खेती को घाटे का सौदा मानने वालों को इन्होंने झुठला दिया। अब छत्तीसगढ़ के प्रगतिशील किसान उन्नत और आधुनिक खेती कर खुशहाली और समृद्धि की ओर बढ़ रहे हैं।

12 वर्षों के सफर में प्रदेश ने हर क्षेत्र में सफलता और उपलब्धियां हासिल की है। खेती की बढ़ती लागत से घाटे के व्यवसाय की ओर उन्मुख कृषि क्षेत्र अब किसानों की समृद्धि का मार्ग प्रशस्त कर रहा है। खेती की लागत कम करने और किसानों की उपज का पूरा दाम देने का सरकार का लगातार प्रयास अब रंग ला रहा है। किसानों के आर्थिक-सामाजिक उन्नयन के लिए इस साल अलग से कृषि बजट लाने के बाद सरकार पैदावार बढ़ाने और खेती को लाभदायक व्यवसाय बनाने के लिए नई कृषि बनाने में जुटी हुई है। यह छत्तीसगढ़ के संवेदनशील और किसान हितैषी सरकार के फैसलों, योजनाओं एवं यहां के किसानों की मेहनत का ही प्रतिफल है कि वर्ष 2010-11 में सर्वाधिक चावल उत्पादन के लिए प्रदेश को कृषि कर्मण पुरस्कार प्राप्त हुआ। प्रदेश के मुखिया डॉ. रमन सिंह ने किसानों का एक-एक दाना खरीदने का वादा निभाया और इस साल 60 लाख मीट्रिक टन धान समर्थन मूल्य पर खरीदा गया। समर्थन मूल्य पर धान खरीदी के मामले में छत्तीसगढ़ इस साल पंजाब के बाद दूसरे स्थान पर रहा।

बीते एक दशक में प्रदेश में किसानों की बेहतरी के लिए कई काम हुए हैं। खेती की महत्ता स्थापित करने के लिए सरकार ने इस साल से अकती (अक्षय तृतीया) को बीज दिवस और हलषष्ठी को किसान दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया है। उन्नत और संकर बीज की व्यवस्था, सिंचाई के साधनों का विकास, खाद व कीटनाशकों की समय पर उपलब्धता, विभिन्न कृषि कार्यों के लिए यंत्रों की उपलब्धता सुनिश्चित करने कृषि सेवा केंद्रों की स्थापना व अनुदान की व्यवस्था एवं मंडियों में किसानों की उपज का पूरा दाम देने के समुचित प्रबंध ने प्रदेश में खेती-किसानी की तस्वीर बदलकर रख दी है। सरकार के इन सार्थक प्रयासों का ही नतीजा है कि धान के कटोरे की फीकी पड़ती चमक अब लौटने लगी है और किसानों का चेहरा दमकने लगा है।

खेती की लागत कम कर किसानों की आमदनी बढ़ाने और कृषि एवं कृषकों के विकास के लिए सरकार ने इस साल पहली बार अलग से कृषि बजट पेश किया। श्री पद्धति से धान उत्पादन, कृषि सेवा केंद्रों की स्थापना, सूक्ष्म सिंचाई योजना, वनग्रामों के पट्टाधारी किसानों को निःशुल्क प्रमाणित बीज, उर्वरक मिनीकिट प्रदाय और भूमि सुधार के लिए हरी खाद के उपयोग जैसी नवीन योजनाएं इस वर्ष शुरू की गई हैं। इसके अलावा कृषि बजट में वर्ष 2011-12 में खरीदे गए धान में 50 रूपए प्रति क्विंटल का बोनस, एक प्रतिशत वार्षिक ब्याज में अल्पकालिक कृषि ऋण, पंप कनेक्शन के लिए 75,000 रूपए तक अनुदान, सिंचाई पंप में मीटर किराया एवं फिक्स चार्ज की समाप्ति और 700 नए उर्वरक गोदामों के निर्माण का लक्ष्य रखा गया है। कृषि ऋण पर एक प्रतिशत ब्याज दर लागू होने के बाद चालू खरीफ मौसम में प्रदेश के किसानों ने 1,333 सहकारी समितियों से 1,580 करोड़ 62 लाख रूपए का ऋण उठाया है।

कृषि विभाग की कृषक कल्याणकारी योजनाओं और किसानों को शासन के विभिन्न कार्यक्रमों के तहत मिल रहे अनुदानों ने प्रदेश में खेती के लिए सकारात्मक माहौल तैयार किया है। इस साल धान, मक्के और सोयाबीन की बुआई उम्मीद से ज्यादा रकबे में हुई है। छत्तीसगढ़ बनने के पूर्व और इसके बाद के कृषि से संबंधित आंकड़ों की तुलना करें तो प्रदेश में किसानों को मिल रही सुविधाओं और कृषि के लिए विकसित अधोसंरचना में जमीन-आसमान का अंतर दिखाई देता है। वर्ष 2000 में जहां किसानों को कृषि ऋण 14 प्रतिशत की दर पर मिलता था वही अब मात्र एक प्रतिशत ब्याज पर उपलब्ध है। राज्य बनने के समय प्रदेश के किसान केवल 150 करोड़ रूपए का ऋण ले रहे थे जो अब बढ़कर 1500 करोड़ रूपए तक जा पहुंचा है।

बीते एक दशक में सिंचाई सुविधाओं में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वर्ष 2000 में सिंचाई पंपों की संख्या 72,400 थी। आज छत्तीसगढ़ में 2,90,000 पंप खेतों में सिंचाई के लिए स्थापित है। महंगी बिजली और इसमें अनियमित कटौती की वजह से किसान अपने पंपों का भरपूर उपयोग नहीं कर पाते थे। इस दिक्कत को दूर करते हुए अब किसानों को चौबीसों घंटे निर्बाध बिजली मुहैया कराई जा रही है। किसानों पर बिजली बिल का ज्यादा बोझ न पड़े इसके लिए उन्हें 7,000 यूनिट तक बिजली मुफ्त दी जा रही है। वर्ष 2000 में जहां प्रदेश का सिंचित रकबा 23 प्रतिशत था वहीं अब 33 प्रतिशत क्षेत्र में सिंचाई सुविधाओं का विस्तार किया जा चुका है। धान और गेहूं जैसे परंपरागत फसलों के साथ-साथ अब छत्तीसगढ़ के किसान गन्ना और साग-सब्जियों जैसी नगदी फसलों की खेती भी करने लगे हैं। वर्तमान में प्रदेश में तीन सहकारी शक्कर कारखाने कवर्धा, बालोद और सरगुजा में स्थापित हैं। गन्ना किसान अपनी फसल इन कारखानों को बेचकर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं।

फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए सरकार खेती के आधुनिक तौर-तरीके अपनाने पर जोर दे रही है। किसानों के लिए संकर एवं उन्नत बीज की व्यवस्था, सिंचाई सुविधाओं का विकास, समय पर खाद और दवाईयों का प्रबंध, मजदूरों की समस्या से निपटने के लिए उन्नत कृषि यंत्रों एवं उपकरणों की खरीदी में अनुदान, एक प्रतिशत ब्याज पर कृषि ऋण, खेती की लागत कम करने के लिए नाडेप खाद, वर्मी कंपोस्ट के इस्तेमाल और जैविक खेती को बढ़ावा देने जैसी अनेक अभिनव योजनाओं ने किसानों को खेती के अनुकूल माहौल प्रदान किया है।

मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने किसानों के प्रति अपनी चिंता हर मौके पर जाहिर की है। कृषि ऋण का ब्याज दर 15 प्रतिशत से घटाते-घटाते सरकार अब इसे एक प्रतिशत तक कर चुकी है। स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर सरकार ने प्रदेश के 90 हज़ार लघु और सीमांत किसानों की कर्ज माफी का ऐलान कर उन्हें बड़ी राहत दी है। फसल बीमा के प्रीमियम अनुदान को पांच प्रतिशत से 20 प्रतिशत बढ़ाने से बड़ी संख्या में लघु और सीमांत किसानों को फसल बीमा का लाभ मिलेगा। प्रदेश में खेती और किसानों की बेहतरी के लिए उठाए गए ये कदम किसानों के प्रति सरकार की संवेदनशीलता बयां करती है। शासन की कृषि और किसानोन्मुखी योजनाओं और कार्यक्रमों का लाभ उठाकर प्रदेश के किसान समृद्धि और खुशहाली की ओर बढ़ रहे हैं।

Friday 19 October 2012

गांव, ग़रीब व किसानों के हित में फ़ैसले

छत्तीसगढ़ की सरकार ने गांव, ग़रीब और किसानों के हित में अभिनव फ़ैसले लेकर हमेशा अपनी संवेदनशीलता का परिचय दिया है। सबके साथ सबका विकास के ध्येय पर चलते हुए मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने इस बार भी स्वतंत्रता दिवस पर राज्य के सबसे ज़रूरतमंद तबके को कई नई सौगातें दी हैं। प्रदेश के 90 हज़ार लघु और सीमांत किसानों की कर्ज़ माफ़ी का फ़ैसला हो या छत्तीसगढ़ के लिए खाद्य सुरक्षा क़ानून बनाने का निर्णय, मुख्यमंत्री ग्राम गौरव पथ योजना के तहत गांवों की गलियों को धूल व कीचड़ से निज़ात दिलाने की कोशिश हो या मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत राज्य के 56 लाख परिवारों को स्वास्थ्य सुरक्षा मुहैया कराने का मसला, हर मोर्चे पर सरकार का जनोन्मुखी चेहरा सामने आया है। 

विगत आठ वर्षों में छत्तीसगढ़ सरकार के प्रयासों और उपलब्धियों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और प्रतिष्ठा मिली है। कई दूसरे राज्यों ने छत्तीसगढ़ की अभिनव योजनाओं का अनुकरण किया है। यहां की सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सर्वोच्च न्यायालय ने देश में सर्वश्रेष्ठ कहा है। इससे उत्साहित होकर सरकार ने यहां रायपुर में प्रयोग के तौर पर कोर पीडीएस योजना भी शुरू कर दी है जिसका विस्तार ज़ल्दी ही भिलाई, दुर्ग, बिलासपुर एवं राजनांदगांव में करने की तैयारी है।

मुख्यमंत्री खाद्यान्न सहायता योजना के माध्यम से प्रदेश के ग़रीबों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के बाद अब सरकार का ज़ोर प्रदेश के लोगों की सेहत की सुरक्षा पर है। मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत प्रदेश के 56 लाख से अधिक परिवारों को इलाज़ की सुविधा मिल सकेगी। ऐसी व्यवस्था करने वाला छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य है। मुख्यमंत्री शहरी स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत प्रदेश की पांच हज़ार बस्तियों में शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खोले जा रहे हैं। ज़िला चिकित्सालयों में जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराने से आम आदमी को सस्ती व प्रभावी दवाईयां मिल सकेंगी। राज्य कर्मचारी बीमा निगम के अंतर्गत पंजीकृत श्रमिकों के लिए 20 नए बीमा औषधालय शुरू किए जा रहे हैं।

स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया संदेश इस बात की ओर साफ़ इशारा करता है कि भोजन, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी ज़रूरतें सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में है। खाद्य और सेहत की सुरक्षा सुनिश्चित करने के बाद सरकार आर्थिक रूप से कमज़ोर तबके को अटल आवास योजना एवं अटल विहार योजना के माध्यम से मकान मुहैया कराने की तैयारी में है। इन योजनाओं के मकानों की रजिस्ट्री पति-पत्नी के संयुक्त नाम से कराए जाने के पीछे महिलाओं की बेहतर सामाजिक सुरक्षा की सोच ही है।

मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने किसानों के प्रति अपनी चिंता हर मौक़े पर ज़ाहिर की है। इस साल अलग से कृषि बज़ट पेश करने के बाद कृषि उत्पादन बढ़ाने और किसानों के आर्थिक-सामाजिक उन्नयन के लिए सरकार नई कृषि नीति बनाने में जुटी हुई है। कृषि ऋण का ब्याज दर 15 प्रतिशत से घटाते-घटाते सरकार अब इसे एक प्रतिशत तक कर चुकी है। स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर सरकार ने प्रदेश के 90 हज़ार लघु और सीमांत किसानों की कर्ज़ माफ़ी का ऐलान कर उन्हें बड़ी राहत दी है। फसल बीमा के प्रीमियम अनुदान को पांच प्रतिशत से 20 प्रतिशत बढ़ाने से बड़ी संख्या में लघु और सीमांत किसानों को फसल बीमा का लाभ मिलेगा। छत्तीसगढ़ सरकार ने किसानों की मेहनत का पूरा दाम देते हुए उनका एक-एक दाना ख़रीदा है। प्रदेश में खेती और किसानों की बेहतरी के लिए उठाए गए ये कदम किसानों के प्रति सरकार की संवेदनशीलता बयां करती है।

छत्तीसगढ़ के हर हिस्से में विकास की रौशनी पहुंचे इसके लिए सरकार कृत संकल्पित है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में गत आठ वर्षों में प्रदेश ने विकास के नए आयाम तय किए हैं और नए कीर्तिमान गढ़े हैं। उम्मीद है स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर रायपुर के परेड ग्रांउड से मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा गांव, ग़रीब और किसानों के हित में की गई ये घोषणाएं उन्हें ज़रूर राहत पहुंचाएंगी। सरकार के ये जनोन्मुखी फ़ैसले विश्वसनीय छत्तीसगढ़ को और ज़्यादा विश्वसनीय बनाएंगे।

Friday 28 September 2012


नए छत्तीसगढ़ की पहचान - नया रायपुर

नया रायपुर देश की सर्वश्रेष्ठ राजधानी बनने की ओर अग्रसर है। छत्तीसगढ़ का नया मंत्रालय भवन लगभग तैयार है और जल्दी ही राज्य के मंत्री व अधिकारी यहां बैठकर प्रदेश का राज-काज चलाएंगे। मंत्रालय भवन के साथ ही नज़दीक में बन रहे विभाग प्रमुखों का दफ़्तर भी पूर्णता की ओर है। 1 नवंबर से प्रदेश का नया मंत्रालय भीड़-भाड़ वाले पुराने रायपुर शहर से निकलकर पूरी तरह इको-फ्रेंडली नई राजधानी नया रायपुर से संचालित होने लगेगी। एक श्रेष्ठ प्रशासनिक शहर की हर ज़रूरतों और सुविधाओं से लैस नया रायपुर विकास की नई कहानियां गढ़ते छत्तीसगढ़ की एक अभिनव तस्वीर पेश करेगा।

8000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैला नया रायपुर 40 सेक्टरों में विभाजित है। मंदिरहसौद और अभनपुर से सटे इलाक़े के 27 गांवों में नया रायपुर विकास की नई इबारत लिख रहा है। यहां यह बात ग़ौर करने लायक है कि नई राजधानी की स्थापना के लिए केवल राखी गांव के कुछ घरों को विस्थापित करने की ज़रूरत पड़ी है। विस्थापित लोगों को सर्वसुविधायुक्त पक्के मकान बनाकर उसी गांव में बसाया गया है। बाक़ी 26 गांवों का अस्तित्व अपने मूल स्वरूप में अब भी बरक़रार है। सभी गांवों में राजधानी के अनुरूप बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं। इन गांवों में शहरी अधोसंरचनाओं का विकास कर स्थानीय लोगों के लिए रोज़गारोन्मुखी कार्यक्रम चलाए जाएंगे। विकास की नई गाथा लिखते छत्तीसगढ़ के जन-सरोकारी सरकार की प्रतिबद्धता की यह बानगी भर है। सबके साथ सबका विकासनई राजधानी के निर्माण में भी चरितार्थ हो रहा है।

नया रायपुर अनोखी विशेषताओं वाला शहर होगा। हरियाली से भरपूर, पूरी तरह प्रदूषण मुक्त यह इको-फ्रेंडली शहर होगा। नया रायपुर में 26.37 प्रतिशत भूमि आवासीय, 26.67 प्रतिशत हरित क्षेत्र, 23.04 प्रतिशत सार्वजनिक व अर्धसार्वजनिक उपयोग, 12.55 प्रतिशत यातायात एवं शेष 11.37 प्रतिशत भूमि व्यवसायिक, औद्योगिक एवं मिश्रित इस्तेमाल के लिए होगी। यहां की पूरी विद्युत व्यवस्था अंडर-ग्राउंड-वायरिंग के ज़रिए होगी। नई राजधानी के सभी दफ़्तर अत्याधुनिक तकनीकों से सुसज्जित पेपरलेस ऑफ़िस होंगे। आधुनिक तकनीक़ से बन रहे इन सभी भवनों की एक और ख़ासियत इनकी पॉवर सेविंग डिज़ाइनहै। इन भवनों में सूर्य की रोशनी और सौर ऊर्जा का भरपूर इस्तेमाल हो सकेगा। सामान्य भवनों की तुलना में इनका अंदरूनी तापमान कम रहेगा, इस वज़ह से इन्हें वातानुकूलित बनाने में कम बिजली की ख़पत होगी। नई राजधानी क्षेत्र में भूमिगत जल के स्तर को बनाए रखने और उन्हें रिचार्ज़ करने के लिए सभी कार्यालयीन और आवासीय भवनों में वाटर हॉर्वेस्टिंग की व्यवस्था रहेगी। नया रायपुर में बन रहे सभी भवनों का निर्माण भूकंपरोधी तकनीक़ से किया जा रहा है। सेक्टर-19 में बन रहे मंत्रालय भवन के क़रीब ही स्थित राखी गांव के बड़े तालाब को छोटी झील के रूप में विकसित करने की योजना है जो इसकी सुंदरता में चार चांद लगाएगी।

नया रायपुर में प्रवेश करते ही इसकी आधुनिकता और भव्यता का अहसास होने लगता है। चमचमाती एक्सप्रेस हाईवे और इसके समानांतर हुए वृक्षारोपण नई राजधानी की ख़ूबसूरती की झलक दिखाते हैं। हाल ही में 1 अगस्त को मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने 75 किलोमीटर लंबी सिक्स-लेन वाली इन सड़कों को लोगों को समर्पित किया है। नए मंत्रालय भवन में सरकार के 40 विभाग एक साथ बैठ सकते हैं। सेक्टर-17 और सेक्टर-19 के 67 एकड़ के विशाल क्षेत्र में विभिन्न प्रशासनिक कार्यालयों, मंत्रालय और यहां काम करने वाले अधिकारियों व कर्मचारियों के लिए आवासीय परिसर का निर्माण किया जा रहा है। सेक्टर-27 और सेक्टर-29 में हाऊसिंग बोर्ड के आवासीय भवनों का निर्माण द्रुत गति से चल रहा है। इनके अधिकांश मकान और फ्लैट्स बिक चुके हैं। यह इस बात का संकेत है कि नया रायपुर केवल शासन-प्रशासन के केंद्र के रूप में ही विकसित नहीं हो रहा है बल्कि यह रहने के लिए लोगों की पसंदीदा जगह भी बन रही है।

नया रायपुर में 550 एकड़ में प्रस्तावित जंगल सफ़ारी और चिड़ियाघर यहां का ख़ास आकर्षण होगा। पचेड़ा और खंडवा गांव के आस-पास प्राकृतिक रूप में मौज़ूद जंगल को जंगल सफ़ारी के रूप में विकसित किया जाएगा। इससे लगे खंडवा जलाशय को एक ख़ूबसूरत झील का रूप देने की योजना है। यहां रहने वाले लोगों को खुशनुमा माहौल देने और उनके आमोद-प्रमोद के लिए नॉलेज पार्क, एम्यूजमेंट पार्क, जलाशय, उद्यान एवं स्पोर्ट्स सिटी की स्थापना भी की जाएगी।

60 हज़ार दर्शक क्षमता वाला देश का दूसरा सबसे बड़ा स्टेडियम शहीद वीरनारायण सिंह अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम परसदा, नया रायपुर में ही है। नया रायपुर के सेक्टर-3 और सेक्टर-4 से लगा यह स्टेडियम आने वाले समय में प्रदेश में खेल गतिविधियों का केंद्र बनेगा। नया रायपुर के पश्चिमी क्षेत्र में छत्तीसगढ़ की परंपरागत कला, संस्कृति एवं मानव विकास की झलक दिखाता पुरखौती मुक्तागंन मौज़ूद है। वहीं नया रायपुर के दक्षिणी छोर पर स्थित हिदायतुल्लाह विधि विश्वविद्यालय एक श्रेष्ठ शिक्षण संस्थान के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। ये संस्थाएं नई राजधानी की रौनक बढ़ाएंगी और इसे एक नई पहचान देगी।

नया रायपुर में परिवहन के सभी साधन उपलब्ध रहेंगे। आधुनिकतम सुविधाओं से लैस स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट की दूरी यहां से केवल 15 मिनट में तय की जा सकती है। मंदिरहसौद के निकट छतौना गांव में नया रायपुर के लिए अलग से रेल्वे स्टेशन प्रस्तावित है। इस नए स्टेशन से मेट्रो रेल चलाने की भी योजना है। नई राजधानी क्षेत्र में फैले सड़कों के जाल पर सिटी बसें भी निरंतर दौड़ा करेंगी।

नया रायपुर न केवल तेज़ी से उभरते छत्तीसगढ़ की राजधानी की तमाम ज़रूरतों को पूरा करेगा बल्कि क्षेत्र के लोगों के लिए रोज़गार की असीम संभावनाएं भी लेकर आएगा। अल्ट्रा-मॉडर्न सुविधाओं से लैस, आधुनिक तौर-तरीक़ों वाला सपनों का यह सुनियोजित शहर प्रगति के नए कीर्तिमान रचते छत्तीसगढ़ को एक नई पहचान देगा।