Friday, 24 June, 2011

बाबूजी...

पहली और दूसरी पोस्ट के बीच डेढ़ साल का अंतराल... दूसरी व तीसरी पोस्ट के बीच सवा साल का अंतराल... ये शानदार रफ़्तार है मेरी ब्लॉगिंग की।

वक़्त के पहियों ने बीते सवा साल में मेरी ज़िंदगी काफ़ी बदल दी है। पिछले दिसम्बर में मैंने अपने बाबूजी को खो दिया। समय-चक्र इतनी तेज़ी से घूमा कि साल भर में ही उनके (बाबूजी) लिए सब कुछ ख़त्म हो गया। 54 साल की उम्र भी भला जाने की उम्र होती है...

पिछले अप्रेल तक हमारा भरा-पूरा परिवार एक शानदार और बेहद खुशहाल ज़िंदगी जी रहा था। किसी को यह अंदाज़ा भी नहीं था कि एकाएक हम सब की ज़िंदगी बदल जाएगी।

पिछले साल मार्च में बाबूजी को दस्त करने में तकलीफ़ होना शुरू हुआ। लगातार इलाज़ और जांच दर जांच से गुजरने के बाद पता चला कि उन्हें रैक्टम कैंसर है। डॉक्टरों ने कहा कि ऑपरेशन और रेडियोथेरेपी देने के बाद यह ठीक हो जाएगा। मई में ऑपरेशन हुआ और उसके कुछ दिनों के बाद रेडियोथेरेपी भी चालू हो गई। रेडियोथेरेपी का असर न होता देख डॉक्टरों ने कीमोथेरेपी भी चालू कर दी। लेकिन किसी भी इलाज़ का कोई फ़ायदा नहीं हुआ और मर्ज़ लगातार बढ़ता गया। दवाईयां उनके शरीर पर ज्यादा रिस्पॉंस नहीं कर रहीं थी। सारी कोशिशों के बाद भी हम बाबूजी को असहनीय दर्द से कराहते देखने को मज़बूर थे।

बाबूजी की सेहत लगातार बिगड़ती देख हम लोगों ने उन्हें टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल, मुंबई रिफ़र करवा लिया। वहां नए सिरे से सारी जांच दोबारा हुई। रिपोर्ट देख कर डॉक्टरों ने स्थिति काफ़ी निराशाजनक बताई। कैंसर के इलाज़ के लिए मौज़ूद तमाम संसाधनों को आज़मा कर भी डॉक्टर ढाई साल से ज्यादा की ज़िंदगी नहीं बता पा रहे थे। हम बदनसीब, लाचार, ख़ुद को धिक्कारने और रोने के अलावा कुछ भी तो नहीं कर पा रहे थे अपने बाबूजी के लिए...

मुंबई में सही ढंग से इलाज़ शुरू हो पाता इससे पहले ही बाबूजी की स्थिति अचानक तेज़ी से बिगड़ने लगी। शरीर के साथ-साथ दिमाग ने भी उनका साथ छोड़ना शुरू कर दिया। उनका शारीरिक तंत्र लगातार कमज़ोर होते जा रहा था। उनकी याददाश्त कमज़ोर पड़ने लगी और उन्हें संभालना मुश्किल होने लगा। मज़बूरन हमें टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के डॉक्टरों से आगे का इलाज़ लिखवा कर बाबूजी को वापस भिलाई लाने का निर्णय लेना पड़ा। बाबूजी को चार सायकल्स में कीमोथेरेपी लगनी थी जो हमने भिलाई इस्पात संयंत्र के कैंसर का इलाज़ करने वाली यूनिट सेक्टर-1 अस्पताल में लगवाने का फ़ैसला किया जहां पहले भी उनका उपचार चल रहा था।

लेकिन क़िस्मत हमारे साथ नहीं थी। मुंबई से दवाईयां लाकर बाबूजी को कीमोथेरेपी के लिए हमने अस्पताल में भर्ती कराया। जांच के बाद डॉक्टरों ने बताया कि किडनी सही ढंग से काम नहीं कर रही है और एचबी भी कम है। हालांकि खून चढ़ा कर एचबी को बढ़ाया जा सकता था। लेकिन कीमोथेरेपी के लिए किडनी का सही ढंग से काम करना ज़रूरी था। लगातार इलाज़ के बाद भी स्थिति सुधरने के बजाय बिगड़ती जा रही थी। उन्हें लोगों को पहचानने में भी दिक्क़त होने लगी और कुछ समय बाद उन्होंने बातचीत भी बंद कर दी। खाना भी लगभग नहीं के बराबर खाने लगे थे। शरीर का दायां हिस्सा बाएं हिस्से की तुलना में कम काम कर रहा था। जब आप अपने ही पिता से यह पूछते हैं कि मैं कौन हूं तो दिल पर क्या बीतती है यह वही समझ सकता है जो इस दौर-ए-ग़म से गुजर चुका हो।

इलाज़ का कोई असर न होता देख अंतत: डॉक्टरों ने भी हाथ खड़े कर दिए और बाबूजी को घर ले जाने की सलाह दी। बाबूजी को हम घर तो ले आए पर हमारी कोशिशें ज़ारी रहीं। छोटे भाई तरुण ने कई दूसरे कैंसर विशेषज्ञों को भी दिखाया पर सबने हाथ खड़े कर दिए। बाबूजी घर पर ही मौत से जूझते रहे। डॉक्टरों के मुताबिक चंद दिनों के मेहमान थे वे। नौकरी की मज़बूरियों के चलते ऐसे कठिन वक़्त में भी हम दोनों भाई उनके पास नहीं थे। शरीर तो ऑफिस में रहता था लेकिन मन घर में होता था। घर से आने वाले एक-एक फोन को देख कर मन सहम जाता था।

हमेशा की तरह बाबूजी शायद हमारी तकलीफ़ों को कम करना चाहते थे। तभी तो डॉक्टरों के सभी अनुमानों को झुठलाते हुए अचानक ही वे दुनिया से रुख़सत हो गए। (डॉक्टरों के मुताबिक कुछ दिनों की ज़िंदगी तो थी उनके पास) 11 दिसम्बर को जब मैं बाबूजी से मिल कर आया था तो बांकी दिनों की तुलना में वे बेहतर दिख रहे थे और आसानी से उन्होंने मुझे पहचान भी लिया था। इस बात का बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं था कि यह हम बाप-बेटे की आख़िरी मुलाक़ात होगी। लेकिन 12 दिसम्बर की अलसुबह 5 बजे अचानक बड़े पिताजी का फोन आया कि तत्काल घर आओ... हालत गंभीर है तो मन आशंका से भर उठा। तुरंत सपरिवार गांव के लिए रवाना हो गया। रास्ते भर मन में बेचैनी रही कि बाबूजी हैं कि नहीं... कल ही तो मिल के आया था उनसे... क्या एक पल में ही मैं पिताविहीन हो जाऊंगा...वगैरह...वगैरह... घर पहुंचा तो कलेजा मुंह को आ गया। अकस्मात ही हमारे सिर से पिता का साया उठ चुका था। कितने अफ़सोस की बात थी कि उनके दोनों बेटों में से कोई भी अंतिम समय में उनके साथ नहीं रह पाया।

बाबूजी के जाने के बाद ऐसा एक दिन भी नहीं बीता है जब मैंनें उन्हें याद नहीं किया हो। 13 जून को उनका जन्मदिन था और 19 जून को फादर्स डे। दोनों ही मौकों पर मैंनें उनकी कमी बड़ी शिद्दत से महसूस की। वे आज होते तो हम उनका 56वां जन्मदिन मना रहे होते। उनके देह के अवसान के बाद अब तो केवल स्मृतियां ही शेष हैं। सचमुच...हमें आपकी कमी हर पल ख़लती है बाबूजी...

3 comments:

संजीव said...

इस पोस्‍ट को पढ़ते हुए मेरे बाबूजी की याद आ गई, कमलेश भाई हम सबके बाबूजी हमारी तकलीफें कम करने के लिए अपनी जिन्‍दगी कम करते रहते हैं।

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छत्‍तीसगढ़ ब्‍लॉगर्स चौपाल में आपका स्‍वागत है.
आरंभ
गुरतुर गोठ

Br.Lalit Sharma said...

प्रत्येक मनुष्य के जीवन में पिताजी की भूमिका आसमानी छत की तरह होती है। इसकी छत्र छाया में ही बच्चा सांसारिक विपत्तियों से महफ़ूज रहता है।

ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है।

ललित डॉट कॉम
ब्लॉग4वार्ता
NH-30 सड़क गंगा

Rahul Singh said...

विनम्र श्रद्धांजलि.